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इमरत बाई की जीविका का सहारा बना आजीविका मिशन

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सफलता की कहानी

भोपाल :

मध्यप्रदेश आजीविका मिशन ग्रामीण क्षेत्रों में जरूरतमंदों के लिये जीविका उपार्जन का बेहतर माध्यम बन गया है। इसका जीवन्त उदाहरण विदिशा जिले के सिरोंज विकासखण्ड के ग्राम वीरपुर में देखा जा सकता है।

ग्राम वीरपुर की इमरत बाई जाटव परम्परागत खेती करके अपना गुजर-बसर करती थी। आजीविका मिशन के अधिकारियों ने उनके गाँव पहुँचकर इमरत बाई को समूह बनाकर काम करने की समझाइश दी। इमरत बाई ने महिला समूह बनाया। समूह से आर्थिक मदद लेकर ड्रिप-मल्चिंग पद्धति से एक बीघा जमीन में मिर्च लगायी। इससे उन्हें 60 हजार रुपये का फायदा हुआ। दूसरे वर्ष सब्जी उत्पादन से उन्हें 80 हजार रुपये की आय हुई। कृषि से बढ़ी हुई आय से उसका उत्साह बढ़ा।

इमरत बाई ने अपने पति रामदयाल को समूह से राशि दिलाकर राज मिस्त्री के औजार खरीद कर दिलवाए। पति-पत्नी की कड़ी मेहनत से परिवार की माली हालत में सुधार आया। इमरत बाई का परिवार पहले दूसरे के खेतों में काम करा करता था, आज खुद का काम करके आर्थिक रूप से सक्षम हो गया है। रामदयाल की बढ़ी आमदनी से उन्होंने बैंक लोन के माध्यम से ट्रेक्टर-ट्रॉली खरीदी। आज वे गाँव में आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों में गिने जाते हैं। वीरपुर के इस समूह को बैंक से लगातार लेन-देन करने के कारण बैंक लिंकेज का फायदा भी मिला है।

वीरपुर के सफल समूह से आसपास के गाँव की अन्य महिलाओं को समूह बनाने की प्रेरणा मिली है। इन महिलाओं को भी मध्यप्रदेश आजीविका मिशन द्वारा समझाइश दी जा रही है।

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