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एक छोटी सी दुनिया

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कहानी

 एक छोटी सी दुनिया,


          तो बेटी जो अभी इस दुनिया में नयी जिन्दगी शुरु करने जा रही है उसने अंधेरी दुनिया से दुनिया वो दुनिया जो बहुत रंगीन है, सपनों और आशाओं से बुनी है, यही नहीं उम्मीदों फूलों और कांटों से लद्दी है,में प्रवेश करने जा रही है, वो सोचती है कि कब मैं अपनी मां के गर्भ से जन्म लगी? कब मैं इस दुनिया मैं कांटों के दर्द और फूलों के स्वाद को चखूंगी। इन सपनों के साथ वो 9 महीने बिताती है जब वो दिन आता है कि उसे इस दुनिया को देखने का मौका मिलता है, हां, तब एक बेटी का जन्म होता है। सबसे ज्यादा खुशनसीब है, वो मां जिसने एक बेटी को जन्म दिया परंतु बदलती प्रीत कुछ और ही कहती है वो खुशनसीब बेटी जिसने इतने सपने देखे कि में रंगीन दुनिया में रंगों के बीच खुशियां बिछायूंगी मां का आशीर्वाद पाऊंगी, उन्हें हंस-हंस हंसाउंगी, जब मैं रोऊंगी तो वो दौड़ती आएगी ये सोचकर कि मेरी बेटी को मेरे आंचल की छांव चाहिए और पापा जो मुझे हाथ पकड़ कर चलना सिखाएंगे वो मुझे बोलना सिखायेंगे जब मैं रोऊंगी तो वो मुझे एक बहादुर बेटी की तरह सहना सिखायेंगे वो मुझे मेरी मां की तरह लोरी गा-गा सुलायेंगे और जब मैं रात में जाग जाऊंगी तो मुझे एक भगवान की तरह सहारा देंगे एक बहन जो मां की कमी एक पल नहीं होने देती हैं, उसके होते ऐसा लगता जैसे पूरी दुनिया मेरे हाथों में है जो बहुत ही नन्हें से हैं, और ये दुनिया बहुत ही बड़ी। 

          भाई ये तो रिश्ता ही अनमोल है जब एक बहन संकट मैं है तो वो कहता तू इस दुनिया से मत उर मैं तेरे साथ हूं अब मैं तेरा और इंतजार नहीं कर सकता जल्दी आओ। दारी हां दादी वो मेरी मां को बहुत डांटती है क्योंकि मुण्े जब भूख लगती है उन्हें केवल तब पता चलता है पर मेरी दादी को सबसे पहले इसका अनुभव हेता है।

बस इतने ही रिश्ते है जिसमें मेरी पूरी दुनिया समायी है में इसमें आने के लिए तरस रही सी बहुत मुश्किल से मैंने 9 महीने बिताये और इस दुनिया में आयी इन सबको पाने की उम्मीद से पर ये क्या मुझे तो किसी की पहचान ही नहीं कि मेरी मां, दादी, बहन, भाई और पापा कौन हे मैं किसी को पुकारना चाहती थी पर मुझे, मेरी आवाज समझने वाला कोई नहीं था। क्यों? पर आज हर एक कहना है, बच्चा किसी को जाने या ना जाने लेकिन अपनी मां को जरूर पहचानता ही है पर उस बेटी ने ऐसा क्यों कहा? कि मैंने किसी को भी न पहचाना, मैं उसे और उसके विचारों को जानने की कोशिश करने जा रही थी तो पाया कि एक घर में अगर बेटे का जन्म होता है तो उसके साथ पूरी दुनिया होती है और यदि एक बेटी का तो उसके अपने भी बेगाने से, क्योंकि वो एक बेअी है जब उस बेटी का जन्म हुआ तो उसके पापा जिसमें उसने बहुत उम्मीदें और बहुत सपनें जोड़ रखे थे जिसकी ऊंगली पकडक़र वो चलना सीखना चाहती थी वो उसके पास होकर भी बहुत दूर है क्योंकि एक पापा बेटे की चाह रखते है न कि बेटी की, पर मां, मां तो ममता की मूरत है, शायद भगवान मेरे पास मेरे मां के रूप था जिसके आंचल में एक बेटी थी मुझसे खुशनसीब उस पल कोई न था पर ये क्या वो न केवल एक मां, थी वो सबसे पहले एक औरत, एक पत्नी, एक बहू और एक बेटी थी इनमें कुछ रिश्ते थे जिन्हें वो चाह कर भी नहीं छोड सकती थी जैसे पत्‍नी और बहू शायद इसलिए पर नहीं उसने चाहकर भी उसे अपनी बेटी मानने से मुंह नहीं फेरा वो आज इसी उलझन में है उसने एक बेटे को जन्म क्यों नहीं दिया या क्या एक बेटी मेरे लिए एक  बेटे सा फर्ज निभा पायेगी या नहीं?

          यहां से शुरु होती है मेरी जिन्दगी मैं बहुत खुशहाल परिवार सभी रिश्तों े साथ प्यार से पली बड़ी मुझे सब का प्यार जिनसे मेरी जिन्दगी है। उन सब के साथ पली पर मुझे फिर भी किसी के सहारे ी जरूरत है मैंने ऐसा क्यों महसूस किया? क्योंकि मुझे एक बेअी का प्यार पाने के लिए न केवल मां बल्कि पिताजी का प्यार उनका सहारा होना बहुत जरूरी था ये बहुत खुशी की बात है कि मैं आज चलना सीख रही हूं और मैं खुद अपने आप बिना के सहारे पूरी आजादी साथ चलना, चाहती हूं पर वो तभी संभव है जब पहले मेरे पापा मुझे मेरी ऊंगली पकड़कर चलाये और जब मैं चलने लगूं तो मुझे खुले आकाश उडऩे के लिए प्रोत्साहित करे पर मैं ये पल न जी सकी क्योंकि जब मुझे मेरे पापा के सहारे की जरूरत थी तब मेरे पापा के पास एक  बेअी से ज्यादा जरूरी काम भी था, इसलिए वो व्यस्त है। पर मेरी मां जो मेरे पिताजी का भी फर्ज अदा कर रही है। मुझे चलना सीखा रही है पर वो मुझे डराती भी हूं कि बेटी आगे मत तू अकेली है इसलिए खतरा हो सकता है, बस ये बात मेरे मन मैं बैठ गई है और मैं चल तो सकती हूं पर अकेली नहीं किसी के सहारे के साथ जो हरदम मेरी मां मेरे सहारे की तरह है। मुझे कोई दिक्कत नहीं है बस कभी-कभी मेरे पापा की व्यस्तता और ये भूल जाना आदत अच्छी नहीं लगती है। आज मेरी मम्मी मुझे स्कूल में दाखिला करा आती है। मैं सभी बच्चों को देखती हूं सभी अपने मम्मी और पापा के साथ आए है पर मेरे पापा के पास समय न होने से वो नहीं आ पाते है और फिर से मेरा मन मुझे ललकारता है कि तू आज भी केवल अपनी मां के सहारे है। इसी तरह कई साल बीत जाते है पर मैं चाहकर भी अपने मन को नहीं समझा पाती हूं।


 

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Steptek on 27/02/2020 09:13:52
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